नाम कमाने की लालसा
- Acharya Lokendra
- 1 अक्तू॰ 2021
- 4 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 27 जून 2022
"लोगों में नाम कमाने की लालसा इतनी अधिक है, कि वे इसके पीछे सब कुछ लुटाने को तैयार हैं।"
किसी को धन कमाने की इच्छा है, किसी को प्रसिद्धि प्राप्त करने की चाहना है, तो किसी को शिष्य बनाने की लालसा है। "किसी को एक इच्छा तीव्र है, बाकी दो कम हैं। किसी को दो इच्छाएं तीव्र हैं, एक इच्छा कम है। किसी को तीनों ही तीव्र हैं।" इस प्रकार से संसार में देखा जाता है, कि प्रत्येक व्यक्ति इन्हीं इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात दौड़ लगाता है, परिश्रम करता है।
परंतु परिणाम क्या होता है? "एक इच्छा के कुछ मात्रा में पूरा होते ही वह इच्छा और बढ़ जाती है। उतनी मात्रा में पूरी होने पर, वही इच्छा और अधिक बढ़ जाती है। इसके साथ-साथ कुछ और दूसरी नई इच्छाएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। कुल मिलाकर परिणाम यह होता है, कि व्यक्ति की जितनी जितनी इच्छाएं पूरी होती जाती हैं, उतनी ही वे इच्छाएं और बढ़ती जाती हैं। और उनसे संबंधित अन्य इच्छाएं भी बढ़ती जाती हैं। सारी इच्छाएं कभी किसी की पूरी नहीं हो पाई, और न हो पाएंगी।" क्योंकि मनुष्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान नहीं है, इसलिए वह अपनी सारी इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता। "कुछ इच्छाएं पूरी करने के लिए भी उसे अनेक व्यक्तियों का सहयोग लेना पड़ता है। जिन दूसरे लोगों (मित्र संबंधी रिश्तेदार आदि) का सहयोग लेना पड़ता है, उनमें भी कुछ लोग उस व्यक्ति की इच्छा को पूरा करना नहीं चाहते।" क्योंकि वे स्वयं ऐसी ऐसी इच्छाएं रखते हैं। वे भी सुख चाहते हैं। और वे भी ऐसा ही सोचते हैं, कि "हमारी इच्छाएं ही पूरी होनी चाहिएं, हम इस की इच्छाएं पूरी क्यों करें? यह हमारी इच्छा पूरी क्यों ना करे?" इत्यादि विचारों के कारण आपस में द्वेष उत्पन्न होता है। और उस द्वेष के कारण व्यक्ति अपनी ही इच्छाओं की पूर्ति में पूरा ध्यान देता है, दूसरे की इच्छा पूरी करने में कुछ विशेष सहयोग नहीं देता। "बल्कि बहुत जगह तो विरोध करता है। दूसरे व्यक्ति की इच्छाओं तथा वस्तुओं का नाश भी करता है। उसके काम में अनेक बाधाएं डालता है। तन मन धन से वह प्रयास करता है, कि मेरी ही इच्छाएं पूरी होनी चाहिएं, दूसरे की नहीं।" ऐसे दुष्ट प्रवृत्ति के लोग इस संसार में बहुत अधिक हैं, जो दूसरों को सदा परेशान करते ही रहते हैं।
"अब दूसरी ओर परिणाम यह होता है, कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए तन मन धन सब कुछ लुटा देता है।" उसे अपना नाम चाहिए, प्रसिद्धि चाहिए। वह चाहता है, कि "लोग मुझे पहचानें। भारत से अमेरिका तक की दुनियां मुझे जाने, कि मैं कुछ हूं। और सब जगह मेरी फोटो लगे, लोग मेरी प्रशंसा करें। मेरे गीत गाएं। और मुझे हजारों साल तक याद रखें।"
"परंतु ये सब सपने मात्र हैं। ऐसे सपने किसी के पूरे नहीं होते।" "संसार में वीर भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, महर्षि पतंजलि, महर्षि कपिल, महर्षि कणाद आदि लोगों जैसे कुछ महान पुरुष हो गए हैं, जिन्होंने देश धर्म की रक्षा के लिए प्राणों तक की बाजी लगा दी। तन-मन धन सब कुछ लगा दिया। केवल ऐसे ही परोपकारी महापुरुषों को संसार याद रखता है।"
बाकी तो संसार के सब लोग स्वकेंद्रित हैं। ऐसे स्वकेंद्रित लोगों को कोई याद नहीं रखता। सब अपने ही स्वार्थपूर्ति में लगे हैं। दूर क्यों जाएं, आप अपने घर में ही देख लीजिए। "क्या आपको अपने दादाजी का नाम याद है? हो सकता है, आपको अपने दादाजी का नाम याद हो। परंतु उनके दादा उनके दादा उनके दादा जी, अर्थात आपकी दादाजी की दसवीं पीढ़ी का नाम क्या आपको याद है? कुछ याद नहीं। कोई उनके बारे में विशेष जानकारी इतिहास मालूम नहीं है।" आप अपनी भूतकाल की दसवीं पीढ़ी को भी नहीं जानते।
जैसे आजकल के लोग यह चाहते हैं कि "मुझे लोग हजारों साल तक जानें, पहचानें, और याद रखें।" क्या वैसी ही इच्छा और प्रयत्न आपके दादाजी की दसवीं पीढ़ी नहीं करती थी, कि "मुझे सब लोग जानें और हजारों साल तक याद रखें।" बिल्कुल किया ही होगा। परंतु उसका भी परिणाम क्या हुआ? आप अपने दादाजी की दसवीं पीढ़ी को भी नहीं जानते। उन्हें याद नहीं रख पाए। उनका सब कुछ समाप्त हो गया। "जो आपके दादा जी की स्थिति है, वही स्थिति आपकी भी भविष्य में निश्चित रूप से होगी।"
"आप भी अपनी प्रसिद्धि के लिए तन मन धन लगा रहे हैं। चार, पांच या छह पीढ़ियों के बाद आपको भी कोई नहीं पहचानेगा। कोई याद नहीं रखेगा। तो फिर क्यों अपनी सारी संपत्ति इस काम में लुटा रहे हैं।" "इससे तो अच्छा हो, यदि आप उन वीर भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, महर्षि पतंजलि, महर्षि दयानंद सरस्वती जी आदि महापुरुषों का अनुकरण करें। देश धर्म की रक्षा के लिए तन मन धन लगाएं। तो शायद संसार के लोग आपको याद भी रखें। अन्यथा कुछ ही समय में आपको भी लोग भूल जाएंगे, और सारा खेल ख़त्म।"

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