सनातन धर्म की वैज्ञानिकता
- Acharya Lokendra
- 6 जन॰ 2023
- 4 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 8 जन॰ 2023
सृष्टि के आरंभ में प्रथम मनुष्य की उत्पत्ति के समय माता-पिता, गुरुजन व कोई भी पूर्व जीवित मनुष्य न होने के कारण ईश्वर मनुष्य को नैमित्तिक ज्ञान स्वयं ही प्रथम मनुष्यों को उनके अंतरात्मा में प्रकाशित करता है। वेद सभी प्राणियों के कल्याण के लिए और विशेष रूप से मानव के अंतिम उद्देश्य के लिए आवश्यक ज्ञान का प्रकाश करते हैं। वेदों में मानव मात्र की वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय उन्नति तथा विश्व शांति के लिए सभी मूल तत्व विद्यमान है।
जिस प्रकार परमात्मा ने आँख की सहायता के लिए सूर्य को बनाया है। अर्थात यदि सूर्य न हो तो आँख भी कुछ दिखा नहीं सकती। उसी प्रकार बुद्धि के लिए ज्ञानरूपी सूर्य प्रदान किया है। जैसे सूर्य न हो तो आँख बेकार हो जाती है वैसे ही ज्ञान न हो तो बुद्धि भी व्यर्थ हो जाती है।
हम जब भी कोई नई वस्तु खरीद कर लाते हैं तो उसके प्रयोग व रखरखाव की सही-सही विधि जानने के लिए प्राय: उस वस्तु के निर्माता की तरफ से पूरा विवरण दिया जाता है आजकल वह एक मैन्युअल या विवरण पुस्तिका के रूप में उपलब्ध होता है, जो आप बाजार से नई चीज खरीद कर लाते हैं उसी समय कंपनी का मालिक यह सारी व्यवस्था करता है। ठीक उसी प्रकार परमात्मा ने सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त कराने के लिए सृष्टि के आदि में ही प्रथम मनुष्य को अपनी कल्याणी वेदवाणी प्रदान की।
वेद ईश्वरीय ज्ञान है। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद सार्वभौमिक, सार्वकालिक, युक्तियुक्त और वैज्ञानिक शिक्षा प्रदान करते हैं। मानव मात्र का परम उपकार वेदों की सत्य और वैज्ञानिक शिक्षा पर आचरण करके ही हो सकता है।
इन वेदों का नाम सुनते-सुनते भारत के सब लोग बड़े होते हैं, सुनते-सुनते ही बूढ़े होकर संसार से चले जाते हैं, लेकिन कभी मन में जिज्ञासा नहीं करते कि इन्हें जानना समझना चाहिए कि आखिर ये वेद है क्या? वेदों का केवल परिचय यहाँ सरल तरीके से आप प्राप्त कर सकें। इसके लिए हम यहाँ प्रयत्न कर रहे हैं। उसे समझने में आसानी होगी। और आप स्वयं को भाग्यशाली अनुभव करेंगे कि मृत्यु से पहले कम से कम पता तो चला कि वेद क्या हैं? वेद क्या कह रहे हैं? क्या करना चाहिए और मनुष्य क्या कर रहे हैं?
सनातन धर्म के मूल ग्रन्थ वेद है जो सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वश्रेष्ठ, युक्तियुक्त, विज्ञान सम्मत, सर्वथा पवित्र, निष्पक्ष, तत्त्वज्ञान से परिपूर्ण व मानव मात्र के उपकार के लिए हैं।
🌷वेदों की मुख्य विशेषताएँ है-
वेद ईश्वरीय नित्य ज्ञान है जो कि सृष्टि के आरंभ में ही प्रथम मानव को दिया जाता है।
वेदों में शब्द यौगिक या योगरूढि है, केवल रूढ़ि नहीं। यौगिक अर्थ होने के कारण अग्नि, इन्द्र, वरूण, यम, वायु, रूद्र आदि शब्द अनेक अर्थों को कहते है। शब्दों के आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक अर्थ में प्रयोग भिन्न-भिन्न वस्तु या व्यक्ति के लिए किया जाता है।
वेद एकेश्वरवाद का प्रतिपादन करते हैं। वेदों में अध्यात्म विद्या के अतिरिक्त भी सभी भौतिक विद्या का मूल ज्ञान विद्यमान है।
वेदों में जन्म से जाति प्रथा का कहीं भी वर्णन नहीं है वहाँ कर्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जन्म से नहीं इनका विभाजन कर्म (कार्य) अनुसार है।
वेदों के अनुसार यज्ञ का अर्थ जगत के कल्याण हेतु किये जाने वाले सभी शुभ कर्म करने से है। यज्ञ शब्द यज् धातु से बना है जिसका अर्थ देवपूजा, संगतिकरण व दान है। यज्ञों में पशुहिंसा वेद विरूद्ध है, पाप है। वेदों में यज्ञ के लिए 'अध्वर' शब्द बहुत जगह पर आया है जिसका अर्थ है अहिंसक।
वेदों में पुत्र और पुत्री का समान महत्व है। उनको उन्नति करने के समान अधिकार व अवसर प्राप्त होने चाहिए।
वेदों में अनित्य (नष्ट होने वालों का) इतिहास नहीं है। वेदों में वर्णित वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, जमदग्नि, काण्व इत्यादि नामों से कई बार लगता है कि यह इतिहास के पुरूष है, लेकिन ये नाम व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि यौगिक अर्थ को बताते हैं। जैसे "प्रजापतिर्वै वशिष्ठ:"(शत.ब्रा.) अर्थात् सबको बसाने के कारण प्रजापति (ईश्वर) ही वशिष्ठ है। "श्रोत्र वै विश्वामित्र: ऋषि:" अर्थात् वेदवाणी को ग्रहण करने वाले कान (कर्ण इन्द्रिय) है, इसलिए मुक्ति कराने में सबसे बड़े मित्र श्रोत्र अर्थात कान ही विश्वामित्र है। साक्षात् कराने वाले होने से ये ऋषि कहलाते हैं जैसे "मनो वै भरद्वाज: ऋषि:" अर्थात् सब प्रकार से आत्मा का भरण पोषण करने वाला मन ही भरद्वाज ऋषि है। अतः वेदों में इतिहास खोजने की चेष्टा जो करते हैं, वे या तो मूर्ख है या धूर्त है।
वेदों के अनुसार परमात्मा का अवतार नहीं होता। वह निराकार, सर्वव्यापी है। 'न तस्य प्रतिमा अस्ति'(यजु.) अर्थात् उसकी कोई मूर्ति या चित्र नहीं बनता। न उसका भेजा कोई पैगम्बर है, न एजेंट जो ईश्वर की जगह उपास्य पूजनीय हो सके।
वेदों का ईश्वर पूर्ण न्यायकारी है।
तैंतीस कोटि(प्रकार) के देवता ईश्वर से भिन्न है, लेकिन इन सब देवों में सबसे बड़ा देव होने से पूजनीय, उपास्य केवल सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान ईश्वर ही है।
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आचार्य लोकेन्द्र:

नोट:-
यौगिक शब्द - जो शब्द अनेक अर्थों को कहते हैं जैसे - गौ
गच्छति इति गौ। अर्थात् जो गमन करती हैं वह वस्तु गौ होती है। इसके अनुसार सूर्य की किरणें भी गौ है, वाणी भी गौ है, पृथ्वी भी गति करने से गौ है, नेत्र आदि इन्द्रियां भी गमनशील होने से गौ है और गमन करती गाय खुश रहती हैं तो गाय भी गौ है।
योगरूढि शब्द - जब लोक व्यवहार में विभिन्न अर्थों को कहने वाले किसी शब्द का किसी एक विशेष अर्थ के लिए प्रयोग होने लगता हैं तो वह योगरूढि शब्द कहलाता है जैसे संसार में 'गौ' का अर्थ गाय के लिए योगरूढ हो गया है। वरना गति तो भैंस, बकरी, घोडा आदि बहुत से करते हैं। लेकिन सबको गौ नहीं कहते। गौ कहने से गाय को ही लिया जाता है घोड़े को नहीं। ऐसे ही पंकज शब्द कमल के लिए योगरूढ़ हो गया। पंक: जायते इति पंकज: अर्थात् जो कीचड़ में उत्पन्न हो उसे पंकज कहते हैं अब कीचड़ में तो कीड़े भी उत्पन्न होते हैं, सिंघाड़ा फल भी लेकिन संसार में कमल को ही लिया जाता है।
रूढ़ि शब्द - जो न यौगिक अर्थ दे सकते हैं और न विशेष अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। केवल अन्ध परम्परा से चलने वाले शब्दों के व्यवहार को रूढ़ि कहा जाता है। जैसे - आजकल सन्यासी को "बाबा" जी शब्द से लोग पुकारते देखे जाते है, जबकि यह न यौगिक है और न ही योगरूढि।
आचार्य जी वेदों के बारे में जानकारी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, मैं तो इस ज्ञान से बिल्कुल अनभिज्ञ हूं। आचार्य जी आप को कोटि कोटि प्रणाम।