
जीवात्माएँ (Soul)
"अत सातत्यगमने" इस मूल धातु से आत्मा शब्द बना है, जिसका अर्थ सतत गमन करने वाला या निरन्तर पुरूषार्थ करना जिसका धर्म है, वह आत्मा है। यह चेतन है अर्थात् चितिशक्ति से युक्त या कहे कि ज्ञान से युक्त होता है।
वह अणु परिमाण (सूक्ष्म) है, एकदेशी, अजर-अमर, अविनाशी, अल्पशक्तिवाला, अल्पज्ञ, प्रकृति के साथ बंधन में आने वाला चेतन है। जीवात्माएँ असंख्य है, हम गिन नहीं सकते। ईश्वर ही जीवात्माओं की संख्या जानता है।
आत्मा का मूल स्वरूप क्या है? आत्मा की पहचान किन लक्षणों से होती है? (What is the basic nature of the soul? What are the characteristics of the soul?)
आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव वाला है। यह अनादि, अनंत, एक स्थान पर रहने वाला या एक शरीर में अणु परिमाण अर्थात सूक्ष्म स्वरूप वाला है, निराकार है।
प्राणवायु को भीतर लेना और बाहर निकालना जिसके द्वारा होता है, आँखों /पलकों को नीचे-ऊपर उठाना जिसके द्वारा होता है, प्राणों को धारण करना, मनन करना अर्थात ज्ञान जिसको होता है, गमन करना, जैसी इच्छा चाहे, जहाँ चाहे वहाँ कार्य में प्रवृत्त होना, इंद्रियों को विषयों में चलाना, विषयों का ग्रहण करना और ज्वर, भय, क्षुधा, तृषा आदि का जिसे अनुभव होता है, वह आत्मा है। सुख-दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, ज्ञान यह सब जिसको होते हैं या जिसके द्वारा अनुभव होते हैं उसका नाम आत्मा है।
यह आत्मा की पहचान है, लक्षण है। अर्थात् जहाँ-जहाँ यह सब होता है वहाँ-वहाँ आत्मा समझना चाहिए।
जीव और आत्मा में सम्बन्ध (Relationship between organism and soul)
आत्मा ही शरीर धारण करने के बाद जीव कहा जाता है। दोनों एक ही है। शरीर में जो आत्मा है व ही जीव है। जीवात्मा ओर आत्मा दोनों एक ही बात है।
जीव और ईश्वर में अन्तर (Difference between soul and God)
ईश्वर बंधन से रहित है, जबकि आत्मा बंधन में आता है, शरीर धारण करता है।
ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ व सर्वांतर्यामी है, जबकि आत्मा एक देश में, एक स्थान पर, बिंदु मात्र है, अणु से भी सूक्ष्म है, अल्प शक्ति वाला है, अल्प ज्ञान वाला है और सब जगह की बातें एक साथ नहीं जान सकता।
ईश्वर इस जगत का स्वामी है और हम सब जीव उसकी प्रजा है। उसके दिए शरीर, साधनों एवं ज्ञान से आनंद प्राप्त करते हैं।
आत्मा व परमात्मा का अनुभव/दर्शन कैसे होता है? (How to do experience of the soul and the Supreme Soul?)
आत्मा तो निराकार है। उसका कोई परिमाण नहीं है। उसकी लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई, मोटाई कुछ भी नहीं है। वह तो चेतन है। उसे नेत्रों से नहीं देखा जा सकता है। आँखों के द्वारा जो देखता है उसे आँखें कैसे देखें। जो आँखों के अंदर से देख रहा है भला आँखें उसको कैसे दिखाएगी। उसे एकाग्र, पवित्र मन के द्वारा समाधि अवस्था में प्रत्यक्ष किया जा सकता है।
समाधि अवस्था में आत्मा व परमात्मा का अनुभव होता है। समाधि दो प्रकार की होती है। संप्रज्ञात् समाधि और असम्प्रज्ञात् समाधि। स्वच्छ, शांत, एकाग्र एवं निर्मल मन के द्वारा संप्रज्ञात समाधि होती है। उस अवस्था में मन के द्वारा आत्मा को देखा/प्रत्यक्ष किया जाता है। तथा ज्ञान एवं वैराग्य से मन की निरुद्ध अवस्था में असम्प्रज्ञात् समाधि होती है। समाधि की इस अवस्था में आत्मा के द्वारा ईश्वर साक्षात्कार किया जाता है। जो जीवन का अंतिम उद्देश्य है। मुक्ति प्राप्ति के लिए या मोक्ष के लिए सभी दु:खों से छूट जाने के लिए।
किसी वैदिक गुरु, आचार्य या साधक के निर्देशन में समाधि सीखी जा सकती हैं। बिना वेद ज्ञान के कोई भी गुरु या शिक्षक इसे नहीं बता सकता।
जीवात्मा का सफर/ यात्रा कहाँ तक है? (How far is the journey of the soul?)
जीवात्मा अनादि काल से है और अनंत काल तक ईश्वर की शक्ति, सामर्थ्य व उसके दिए गए साधनों से सुख-दुःख, आनंद भोगता है। प्रकृति के साथ संयोग से बंधन में आता है और ईश्वर को प्राप्त करने के बाद बंधन से मुक्त होता है। परान्त काल अर्थात 100 ब्रह्म वर्ष के बहुत लंबे समय के बाद फिर जन्म लेकर बंधन में आता है, फिर प्रयत्न करके मुक्ति प्राप्त करता है। बन्ध और मुक्ति यह निरंतर अनादिकाल से चला आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा। ऐसा कोई समय नहीं जब आत्मा का यह सफर रुक गया हो, अथवा कभी यह सिलसिला रुक जाएगा। ऐसा कभी नहीं होगा। यह अनादि-अनंत प्रवाह है। जीवात्मा मोक्ष की अवस्था में एक बहुत लंबे समय तक जन्म-मृत्यु से बच जाता है, आनंद में रहता है, दुखों से बच जाता है, लेकिन हमेशा के लिए मुक्ति में ही रहेगा ऐसा संभव नहीं, क्योंकि जिसका आरंभ है उसका अंत अवश्य होता है। मुक्ति का आरंभ हुआ है तो अंत भी होगा। इसी तरह बंधन में आया है तो मुक्ति भी होगी।
आत्मा जन्म कैसे लेता है? जीवात्मा शरीर में कब प्रवेश करता है? (How does a soul take birth? When does the soul enter the body?)
वैसे तो आत्मा अजन्मा है, अनुत्पन्न है, अनादि अनंत है, वह न जन्म लेता हैं, न मरता है। तो आत्मा का जन्म लेना जो कहे तो वह गलत बात है। हाँ आत्मा प्रकट होता है। उसका प्रकृति के साथ संयोग होने पर, शरीर के माध्यम से प्रादुर्भाव होता है, इसे जन्म कहते हैं। जन्म शब्द संस्कृत व्याकरण में "जनि प्रादुर्भाव" धातु से बनता है, जिसका अर्थ है प्रादुर्भाव अर्थात् प्रकट होना।
आत्मा का माता के गर्भ में शुक्र और रज कणों के संयोग के समय ईश्वर द्वारा शरीर से संबद्ध किया जाता है। आत्मा स्वयं तो हिल भी नहीं सकती। जो शरीर से बाहर है, उसे ईश्वर ही जहाँ उपयुक्त माता-पिता के संयोग समय ले जाता है। माता-पिता के संयोग या गर्भाधान संस्कार के समय आत्मा गर्भ में आती है। अतः जन्म माता-पिता के निमित्त से ईश्वर के द्वारा होता है।
शरीरधारी आत्मा को स्वाभिमानी आत्मा कहते हैं। जिसे अभी जन्म नहीं मिला, उसे अनुषयी आत्मा कहते हैं। जिसके लिए उपयुक्त माँ का गर्भ अभी तैयार नहीं, ऐसी आत्मा जो प्रतीक्षा /वेटिंग में है, वह भटकती नहीं वह सुप्त रहती है। ओर तीसरी अवस्था मोक्ष प्राप्त आत्मा की है। उसे मुक्त आत्मा कहते है, जो जन्म-मृत्यु से छूट गई है।
शरीर में आत्मा कहाँ रहती है? (Where does the soul reside in the body?)
मानव शरीर में आत्मा छाती के बिल्कुल बीचोबीच गहराई में हृदय प ्रदेश में रहती है। वह सूक्ष्म व निराकार है। पूरे शरीर में उसकी चेतना इसी तरह है, जैसे एक कक्ष में दीया एक स्थान पर रहते हुए भी पूरे कक्ष को प्रकाशित करता है।
आत्मा शरीर कैसे छोड़ती है? (How does the soul leave the body?)
अंत काल में जिन विषय के साथ मनुष्य देह त्याग करता है उन्हीं से संबंधित अंगों के द्वारा आत्मा शरीर से बाहर हो जाती है। जो ज्ञान की उच्च अवस्था में देह त्याग करता है, वह आत्मा सिर के सबसे ऊपर के भाग ब्रह्मरन्ध्र से बाहर होता है। और जो जीवन भर भोग वासनाओं से, तृष्णाओं से पीड़ित रहता है, अंतकाल में उसे तड़पते, बिलखते, सिसकते हुए इस संसार को छोड़कर जाना पड़ता है। वह शरीर के उन्ही इन्द्रियों के मार्ग से निकलता है जिन मन, इन्द्रियों के वशीभूत होकर जीवन भर नाचता था।
आत्मा भटकती क्यों है? मृत्यु के बाद आत्मा कितने दिन भटकती है? (Why does the soul wander? For how many days does the soul wander after death?)
सर्वप्रथम तो यह समझ लेना चाहिए कि आत्मा बिना शरीर के, बिना साधन के हिल भी नहीं सकती। भटकना तो बहुत दूर की बात है। आत्मा अपने आप कहीं नहीं जाती, इधर-उधर भी नहीं जा सकती। हवा उसको अपने साथ नहीं ले जा सकती। ईश्वर ही आत्मा को उसके कर्म के आधार पर जिस घर में, जिस माता-पिता के यहाँ, जिस योनि में भेजना है, वहाँ पर यथायोग्य, न्याय पूर्वक आत्मा को संकल्प मात्र से एक क्षण में भेज देता है। अतः आत्मा भटकती नहीं है। उसका दूसरा जन्म हो जाता है। दूसरा शरीर मिल जाता है। फिर यह भूत-प्रेत आदि कैसे लोगों को दु:खी कर देते हैं! यह भूतोन्माद रोग होता है।
तो इसका उपचार कराना चाहिए। यह आयुर्वेद के शास्त्रों में वर्णित है। इसका विधिवत उपचार हो जाता है। यह एक रोग है, यह असामान्य रूप से प्रकट होता है तो परिजन डर जाते हैं और कई बार किसी तांत्रिक क्रियाओं को कराते हैं। यह ठीक नहीं। हिस्टीरिया आदि के चलते या मानसिक विकारों से भी यह रोग उत्पन्न हो जाता है। इसका समाधान भी होता है। भूतोंन्माद की चिकित्सा बहुत अच्छी तरह से हो जाती है। इसमें कुछ विशेष यज्ञ आदि का विधान भी करना होता है। इसका वर्णन-चिकित्सा हम आगे करेंगे। बस यहाँ पर इतना ही बताया जा रहा है कि आत्मा भटकती नहीं, किसी की आत्मा किसी के शरीर में नहीं घुस सकती। उसको नया शरीर ईश्वर ही दे सकता है। वैसे तो बहुत सारी आत्माएँ हमेशा हमारे आस पास रहती ही है, लेकिन उनसे हमें कोई हानि नहीं हो सकती।
आत्मा के साधन (Tools of the soul)
आत्मा चेतन है। अजर, अमर, अविनाशी है। तथा शरीर जड़ है, निर्जीव है और उत्पन्न होता है। नष्ट भी होता है। आत्मा, शरीर का प्रयोक्ता है, रथी है। शरीर एक साधन है, जिसके द्वारा आत्मा सुख-दु:ख भोगता है और मोक्ष को प्राप्त करता है। आत्मा साधक है, शरीर साधन है और ईश्वर साध्य है।
ईश्वर प्राप्ति के लिए मानव शरीर आवश्यक है। अन्य शरीरों में ईश्वर प्राप्ति करना संभव नहीं, क्योंकि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है। यह कर्ता है। कर्ता वही होता है, "कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुम् य: स्वतन्त्र: स कर्ता" अर्थात् जो कर्म करने में, न करने तथा उल्टा सीधा जैसा भी चाहे करने में स्वतंत्र हो। उसे ईश्वर ही न्यायपूर्ण ढंग से फल देता है। जो परतंत्रता में कार्य करें उसे कर्म का फल नहीं मिलता। केवल मानव शरीर में स्वतन्त्र रहकर जो जीवात्मा कर्म करता है उसे ही कर्म का फल मिलता है। अन्य योनियाँ तो भोगयोनि है। कर्म का फल उन सबको नहीं मिलता।
जीव का लक्ष्य और लक्ष्य प्राप्ति का उपाय (Goal of the organism and the means of achieving the goal)
प्रत्येक जीव का लक्ष्य नित्य सुख और आनंद की प्राप्ति अर्थात मोक्ष है। जिसे वह ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त कर सकता हे। ईश्वर प्राप्ति के उपाय के लिए यहाँ क्लिक करे।